
पश्चिम बंगाल में चुनाव का पूरा नैरेटिव अब रक्षा बनाम विस्तार की सीधी जंग में बदल चुका है।राजनीतिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि 2026 का चुनाव बंगाल की राजनीति के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। एक तरफ तृणमूल अपना मजबूत जनादेश बचाने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर भाजपा सत्ता में आने के प्रयास में जुटी है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मुकाबला स्पष्ट रूप से दो ध्रुवों में सिमटता दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस इस बार गढ़ बचाने की चुनौती से जूझ रही है, जबकि मुख्य विपक्ष भाजपा सत्ता के करीब पहुंचने की रणनीति पर जुटी है। चुनाव का पूरा नैरेटिव अब रक्षा बनाम विस्तार की सीधी जंग में बदल चुका है। यह सीधी जंग ही बंगाल के चुनाव को हाल के वर्षों का सबसे अहम और संभावित रूप से ऐतिहासिक बना रहा है। वर्ष 2021 के चुनाव में मुकाबला द्विध्रुवीय नहीं दिख रहा था, लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया था कि मुकाबला इन्हीं दो दलों के बीच था।कांग्रेस और वामदल कहीं टिक नहीं सके थे। राजनीतिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि 2026 का चुनाव बंगाल की राजनीति के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। एक तरफ तृणमूल अपना मजबूत जनादेश बचाने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर भाजपा और बेहतर प्रदर्शन कर ममता का तिलिस्म तोड़कर सत्ता के करीब पहुंचने की सबसे बड़ी कोशिश कर रही है। चुनाव तय करेगा कि बंगाल क्षेत्रीय प्रभुत्व के मॉडल को बरकरार रखता है या राष्ट्रीय विस्तार की राजनीति को स्वीकार करता है। यह चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन बदलने की संभावनाओं का चुनाव बन गया है।पिछले चुनाव में तृणमूल को 48 और भाजपा को 38% वोट मिले थे। 2016 और 2021 में 40 से ज्यादा सीटों पर जीत का अंतर 5 हजार वोट से कम रहा। 2 से 5% वोट स्विंग भी कई सीटों पर नतीजे पलट सकता है।बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक बहुकोणीय मुकाबले की परंपरा रही। पहले वाम दलों का वर्चस्व, फिर तृणमूल का उभार, लेकिन 2026 में पहली बार तस्वीर स्पष्ट रूप से द्विध्रुवीय दिख रही है।




