
सीएम नीतीश कुमार ने विधानपरिषद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद से बिहार में सियासी हलचल तो तेज हो गई, लेकिन नीतीश की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए। बिहार के सियासी हालात और राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की रहस्यमय चुप्पी बशीर बद्र के एक शेर की याद दिलाती है कि ‘कुछ तो रहीं होंगी मजबूरियां उनकी, यूं कोई बेवफा नहीं होता। जी तो बहुत चाहता है कि सच बोलूं, क्या कहें हौसला नहीं होता।’राज्यसभा जाने और मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सजग मुख्यमंत्री से चुप्प मुख्यमंत्री का सफर न जाने क्यों कुछ सोचने को बाध्य करता है। ये संशय के माहौल को विश्लेषित करने की जरूरत पर इशारा भी करता है। विश्लेषण की जरूरत तो इस बात की भी है कि संशय का ऐसा माहौल बनाने के जिम्मेवार कौन हैं? इस यक्ष प्रश्न के जवाब तक पहुंचने के लिए कुछ स्थितियों को समझना होगा। समझिए, बिहार में बदलती राजनीति के सुर को।राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एमएलसी पद से इस्तीफा देना उतना नहीं चौंकाता, जितना कि उनके इस्तीफा देने का तरीका। खास कर उस व्यक्ति के सापेक्ष जिन्होंने शुचिता की राजनीति की, संविधान का और संवैधानिक संस्था का सम्मान किया, सदन पर मत्था टेका। लेकिन अलविदा कहने के सामान्य शिष्टाचार से भी खुद को अलग रखा। 20 साल तक जिस सदन के आधार पर राज्य के 10 बार मुख्यमंत्री बनने की शपथ ली उसे निहारने तक की जरूरत नहीं समझी। वह भी मुख्यमंत्री आवास से चंद कदम दूर। सहज रूप से विश्वसनीय नहीं लगता। और तो और, सदन से इस्तीफा देने के लहजे में शब्द की कंजूसी लेखनी के मजबूत सिपाही नीतीश कुमार के किरदार के विपरीत स्वभाव सा दिखता है। त्यागपत्र देते क्या लिखा, एक बानगी देखिए।सदन के प्रति आभार ,सम्मान कुछ नहीं। वह भी उस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जो समृद्धि यात्रा की दौड़ में खुद को शामिल कर अब भी अपनी राजनीति को बुलंद कर रहे हैं। ऐसे में संशय होता है कि नीतीश कुमार को अंधेरे में रख कर कौन चला रहा है तीर?बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान 25 से 30 फिर से नीतीश के न जाने कितने बोर्ड लगाए गए होंगे। NDA की बंपर जीत के आधार में इस स्लोगन के महत्व को कमतर नहीं आंका जा सकता। जनादेश का सम्मान करने वाले राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जनादेश का अपमान क्यों करते दिख रहे हैं? सवाल फिर खड़ा होता है कि नीतीश कुमार को अंधेरे में रख कर कौन चला रहा है तीर?




