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दुनिया के लिए शांति ही है सही रास्ता, जंग रोकने के सारे प्रयास विफल हो रहे

दुनिया के लिए शांति ही है सही रास्ता, जंग रोकने के सारे प्रयास विफल हो रहे

पूरा विश्व जहां एक ओर युद्ध की आंच में उलझा हुआ है, वहीं भारत हमेशा से ही शांति की सलाह देता रहा है। वर्तमान स्थिति में आज नई दिल्ली को विश्व शांति के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। विश्व गुरु के रूप में भारत से ऐसी भूमिका अपेक्षित है।श्यामलाल पार्षद का एक मशहूर गीत है, ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।’ स्वाधीनता संग्राम के जमाने में यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था और आज भी है। 1938 के कांग्रेस अधिवेशन में इसे आधिकारिक तौर पर झंडा गीत के रूप में स्वीकार किया गया। जब महात्मा गांधी की नजर इस गीत पर पड़ी, तो उन्होंने ‘विजयी’ को काटकर उसकी जगह ‘प्रेमिक’ लिख दिया – प्रेमिक विश्व। यह भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है, जिसमें दूसरों पर विजय प्राप्त करने या विस्तारवाद की कोई लालसा कभी नहीं रही। लेकिन, पूरी दुनिया हजारों वर्षों से इसी लालसा के कारण युद्ध की आग में जल रही है।दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित करना और अपनी सीमा का विस्तार करना, यह ऐसी कुत्सित मानसिकता है, जो दुनिया में अमन-चैन रहने नहीं देती। 1949 में अल्बर्ट आइंस्टाइन से जब पूछा गया कि तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, तो उन्होंने जवाब दिया कि तीसरे का तो उन्हें पता नहीं, लेकिन चौथा पत्थरों से लड़ा जाएगा, क्योंकि तीसरे में सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो जाएंगे। 1955 में रसेल-आइंस्टाइन मैनिफेस्टो जारी किया गया, जिसमें परमाणु खतरे के बारे में चेतावनी दी गई।द्वितीय विश्व युद्ध से पूरी दुनिया तबाह हो चुकी थी। यह इतिहास का सबसे भयावह युद्ध था, जिसमें छह से आठ करोड़ लोग मारे गए थे। इसके पहले प्रथम विश्व युद्ध में 1.5 से 2.15 करोड़ लोग मारे गए और इससे भी अधिक घायल हुए। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगों के विस्थापन से स्पेनिश फ्लू फैल गया, जिसमें 5 से 10 करोड़ मौतें हुईं। इसके बाद ‘लीग ऑफ नेशंस’ की स्थापना की गई, ताकि भविष्य में कोई लड़ाई नहीं हो, लेकिन उसके बाद और भयानक जंग हुई।द्वितीय विश्व युद्ध के दरम्यान लीग ऑफ नेशंस के मुख्यालय में ताला लगा रहा। उसकी असफलता के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई, लेकिन वह भी एक तमाशा बनकर रह गया। वह कोई भी युद्ध नहीं रोक पाया। उसकी संरचना भी दोषपूर्ण है। पांच देशों ने सारी शक्ति अपने हाथ में ले ली है। उनके पास वीटो का अधिकार है और परमाणु बम रखने का भी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना अमेरिका ने 2003 में इराक पर हमला बोल दिया और 2022 में रूस ने यूक्रेन पर। ईरान पर ताजा हमले के लिए भी किसी की मंजूरी नहीं ली गई।

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