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काबुल से बग़दाद तक, अमेरिका का ‘Regime Change’ मॉडल कितना कारगर?

नए साल को शुरू हुए दो दिन नहीं बीते थे कि ऊर्जा पर नियंत्रण को लेकर दादागिरी के खेल की शुरुआत हो गई। एक आजाद देश के राष्ट्रपति को उसकी पत्नी के साथ उसके बेडरूम से जानवरों की तरह घसीट कर निकालना। इसके बाद बेशर्मी से उसकी परेड करवाना। कहीं आंखों में पट्टी बांधकर घुमाना, कहीं हाथों में हथकड़ी डालकर घुमाना। यह मंजर आज दुनिया को बता रहा है कि अगर आप कमजोर हैं तो चाहे आपके पास कितना तेल हो, जनता का वोट हो, पैसा हो, तुम्हारी कोई औकात नहीं है। अमेरिका ने साफ कर दिया है कि ना खाता ना वही जो अमेरिका के हित में है वही सही। और उसने दुनिया को आज यह भी स्पष्ट कर दिया कि नियम, कायदे, कानून जो है वह सिर्फ कमजोर देशों के लिए अमेरिका के लिए नहीं है। यूएन जो है वह सिर्फ कागजों तक सीमित है। लोकतांत्रिक बातें वहीं तक अच्छी हैं जहां पर अमेरिका का भला हो।
2001 के अंत में जब अमेरिकी समर्थित सेनाएँ काबुल में दाख़िल हुईं, तो दुनिया ने इसे आतंक के ख़िलाफ़ निर्णायक जीत के रूप में देखा। कुछ ही हफ्तों में तालिबान सत्ता से बेदख़ल हो गया और अमेरिकी समर्थन से हामिद करज़ई को अफगानिस्तान की कमान सौंपी गई। उस दौर में वाशिंगटन को भरोसा था कि सैन्य हस्तक्षेप के ज़रिये न केवल आतंकवाद को रोका जा सकता है, बल्कि मध्य एशिया में लोकतंत्र की जड़ें भी मज़बूत की जा सकती हैं। लेकिन दो दशक बाद वही तालिबान लगभग उतनी ही तेज़ी से सत्ता में लौट आया, जितनी तेज़ी से उसे हटाया गया था। इससे पहले इराक में 2003 का अमेरिकी आक्रमण भी इसी सोच का उदाहरण था, जहाँ सद्दाम हुसैन को तो हटा दिया गया, लेकिन उसके बाद विद्रोह, सांप्रदायिक हिंसा और अस्थिरता का लंबा दौर शुरू हुआ। आज, जब डोनाल्ड ट्रम्प के हालियाहस्तक्षेपों पर चर्चा हो रही है, तो यह ज़रूरी हो जाता है कि अमेरिका के इस पूरे गेम को डिकोड करना जरुरी है। इतिहास साक्षी है कि जल्दबाजी में उठाया कदम आगे नुकसानदेह साबित हो सकता है और यही वर्तमाक वैश्विक परिपेक्ष्य में भी लागू होते हैं।
एक ऑपरेशन 2020 में भी हुआ था। ऑपरेशन गिदोन इसका नाम था। तब अमेरिका ने भाड़े के सैनिकों को समुद्र के रास्ते वेनेजुला भेजा था। उसका प्लान था कि माधुरों को किडनैप करके अमेरिका ले आओ। लेकिन उस वक्त वेनेजुला के मछुआरों और स्थानीय पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। उस वक्त अमेरिका की बेज्जती हुई थी। तब माधुरों की सेना और जासूस वफादार थे। इसलिए इस बार सीआईए और ट्रंप ने रणनीति बदली और कहा बाहर युद्ध लड़ने में सरदर्द है। अंदर वाले खरीद लो। पैसों का इस्तेमाल करो सब बिक जाएंगे। और वही हुआ। डोनाल्ड ट्रंप ने 18 दिसंबर 2025 को खुलेआम यह कहा था कि वेनेजुला का तेल हमारा था। उन्होंने हमारी कंपनियों को निकाला। तेल पर अधिकार जमा लिया।
वेनेजुला के पास इस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। सऊदी अरब से भी ज्यादा। साल 2025 में डॉलर की कीमत गिर चुकी है। दुनिया के कई देश डॉलर छोड़कर अपनी करेंसी में व्यापार कर रहे हैं। अब अगर इसमें वेनेजुला भी अपना इतना बड़ा तेल का भंडार डॉलर के बजाय किसी और करेंसी में बेचता। चाहे वो चीनी, युवान, क्रिप्टो या फिर जो खबरें आ रही थी कि अलग-अलग दुनिया में संगठन जैसे ब्रिक्स हैं वो एक प्लान कर रहे थे तो फिर अमेरिकी डॉलर की बादशाहत खतरे में पड़ जाती। इसीलिए कहानी माधुरों को हटाना या लोकतंत्र बचाने की नहीं थी। यह अमेरिका के डॉलर को वेंटिलेटर से हटाने की थी।
2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला कर राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की सरकार गिरा दी। तब जॉर्ज डब्ल्यू बुश सरकार ने दावा किया कि इराक के पास रासायनिक और जैविक हथियार हैं और वह परमाणु कार्यक्रम दोबारा शुरू कर रहा है। इसी आधार पर युद्ध शुरू हुआ। 2004 में अमेरिकी सरकार के ही इराक सर्वे ग्रुप ने माना कि इराक के पास कोई सक्रिय जैविक हथियार नहीं थे। आज इराक अस्थिरता और हिंसा से जूझ रहा है।
2011 में अमेरिका और नाटो ने लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप किया। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा और लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी थे। अमेरिका ने कहा कि यह हमला नागरिकों की रक्षा और कथित नरसंहार रोकने के लिए जरूरी है। लेकिन 2016 में ब्रिटेन की संसद की विदेश मामलों की समिति ने रिपोर्ट में कहा कि लीबिया पर हमला गलत खुफिया जानकारी पर आधारित था। आज लीबिया गृहयुद्ध से जूझ रहा है।
2017 में अमेरिका ने सीरिया के शायरत एयरवेस पर टॉमहॉक मिसाइलों से हमला किया। तब अमेरिका में ट्रम्प और सीरिया में बशर अल-असद राष्ट्रपति थे। अमेरिका ने कहा कि यह कार्रवाई रासायनिक हमले के जवाब में की गई। लेकिन अमेरिका का दावा पूरी तरह साबित नहीं हुआ। बाद में अमेरिकी ने असद विरोधी एचटीएस को समर्थन दिया और दिसंबर 2024 में असद का तख्तापलट हुआ। सीरिया आज अस्थिरता झेल रहा है।
2001 में 9/11 हमल के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया। तब अमेरिका में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था। अमेरिका ने कहा कि लक्ष्य अल-कायदा को खत्म करना और आतंकवाद रोकना है। यह तर्क सीधे झूठा नहीं निकला, लेकिन 2021 में तालिबान की वापसी ने 20 साल की अमेरिकी रणनीति को असफल साबित कर दिया। देश आज भी तालिबान शासन में है और मानवीय संकट झेल रहा है।
10 अप्रैल 2022 को पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान को अविश्वास प्रस्ताव में हारने के बाद सत्ता से हटना पड़ा। उन्होंने अमेरिका पर साजिश का आरोप लगाया और कहा कि 7 मार्च 2022 को आए एक राजनयिक साइफर में अमेरिकी अधिकारी डोनाल्ड लू ने धमकी भरा संदेश दिया। इमरान ने कहा, स्वतंत्र विदेश नीति के कारण अमेरिका ने सरकार गिरवाई।
5 अगस्त 2024 को विरोध प्रदर्शनों के बीच बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना ने इस्तीफा देकर देश छोड़ दिया। बाद में उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका सेंट मार्टिन द्वीप पर सैन्य एयरबेस चाहता था। उनके इनकार करने पर आंदोलन को समर्थन मिला। इसके बाद अमेरिका से लौटकर मोहम्मद युनूस ने अंतरिम सरकार में पीएम पद संभाला।

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