*मनचले ने मासूम को बनाया हवस का शिकार या मोहब्बत का बहाना? उन्नाव की सीमा 15 मई को गांव के बिट्टू संग लापता, मां की गुहार पर भी मौरावां पुलिस बेपरवाह, अब एसपी से न्याय की आस !*
✍️रिपोर्ट मदन चौरसिया

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की करदहा गांव की नाबालिग बेटी सीमा (काल्पनिक नाम), जो अब तक स्कूल और घर के आंगन तक सीमित थी, अचानक 15 मई को गांव के ही युवक बिट्टू पुत्र मोतीलाल के साथ लापता हो गई। सीमा के पिता रामबहादुर और मां गीता ने जैसे-तैसे अपनी टूटती उम्मीदों को समेटते हुए 27 मई को मौरावां थाने में बिट्टू द्वारा बेटी को बहला-फुसलाकर भगा ले जाने की तहरीर दी।
मगर पुलिस ने इसे एक सामान्य घटना मानते हुए महज एनसीआर दर्ज कर खानापूर्ति कर दी। इसके बाद न तो लड़की की बरामदगी का कोई प्रयास हुआ, न ही आरोपी को पकड़ने की कोई गंभीर कोशिश। जब मां ने थाने के लगातार चक्कर काटे तो हल्का इंचार्ज धीरेंद्र सिंह एक बार गांव तो पहुंचे, मगर उन्होंने बिट्टू और सीमा को पकड़ने की बजाय केवल यह कह दिया कि अगले दिन थाने पर ले आओ।
अगले दिन, सुबह 10 बजे सीमा की मां कुछ ग्रामीणों के साथ थाने पहुंची, मगर न बिट्टू आया, न ही सीमा। इधर, बिट्टू के घर पर ताला लटका मिला, मानो वह पहले ही पुलिस की “सक्रियता” भांप चुका हो। जब मां ने दरोगा से पूछा कि अब क्या होगा, तो उन्हें बस एनसीआर की एक कॉपी पकड़ा दी गई और थाने से चलता कर दिया गया।
पीड़िता की मां गीता का दर्द अब शब्दों से बाहर है। वह पूछती हैं – क्या एक गरीब की बेटी की कोई कीमत नहीं? क्या कानून केवल रसूख वालों के लिए है? क्या पुलिस का काम सिर्फ तहरीर दर्ज करना और फिर मूकदर्शक बन जाना है?
मौरावां पुलिस की बेरुखी और संवेदनहीनता ने एक मां की उम्मीदों को गहरी चोट दी है। अब सीमा की मां मजबूर होकर उन्नाव के पुलिस अधीक्षक से न्याय की गुहार लगाने की तैयारी कर रही हैं। उन्हें उम्मीद है कि एसपी स्तर पर कोई तो उनकी बात सुनेगा, कोई तो उनकी बेटी को वापस लाएगा।
यह घटना केवल एक लड़की के लापता होने की नहीं, बल्कि एक पूरे सिस्टम की संवेदना विहीनता की कहानी है। अब देखना यह है कि क्या एसपी उन्नाव इस मां की पुकार सुनेंगे, या फिर यह मामला भी फाइलों की धूल में कहीं खो जाएगा।



