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कर्ज की चिता पर जल गया समूचा परिवार: पंचकूला में कार बनी मौत की सवारी, 7 लोगों ने एकसाथ खा लिया जहर और चले गए परलोक!

✍️शीतल निर्भीक ब्यूरो

सड़क किनारे खड़ी एक कार। बंद खिड़कियां। भीतर सात लोग, सात खामोशियां, और एक अधूरी कहानी—जिसका अंत इतना खौफनाक होगा, किसी ने सोचा भी नहीं था। हरियाणा के पंचकूला की वो रात कभी नहीं भुलाई जा सकेगी, जब एक ही परिवार के सात लोगों ने एक साथ जहर खाकर मौत को गले लगा लिया।

दिल दहला देने वाली इस घटना ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है। उत्तराखंड के देहरादून से आए एक ही परिवार के सात लोगों ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। सोमवार की रात यह घटना पंचकूला के सेक्टर-27 में घटी, जहां एक हुंडई ऑरा कार के अंदर पूरा परिवार बेसुध हालत में मिला। राहगीरों ने जब कार को संदिग्ध अवस्था में खड़ा देखा, तो ड्राइवर सीट पर बैठे एक व्यक्ति ने कांपती आवाज में बताया कि पूरा परिवार कर्ज में डूब गया था और अब वह इस दुनिया को अलविदा कहने जा रहे हैं।

राहगीरों ने फौरन पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने सभी को तत्काल एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टरों ने बताया कि छह लोगों की मौत हो चुकी थी, जबकि परिवार का मुखिया अभी जीवित था। उसे गंभीर हालत में दूसरे अस्पताल में रेफर किया गया, लेकिन कुछ ही घंटों बाद उसने भी दम तोड़ दिया।

पुलिस को कार के अंदर से एक दो पेज का सुसाइड नोट मिला है, जिसमें परिवार के मुखिया ने आत्महत्या के पीछे की वजहें बताई हैं। नोट में लिखा गया कि वे भारी कर्ज में फंस चुके थे, जिससे उबरने की कोई राह नहीं बची थी। उन्होंने लिखा, “ये सब मेरी गलती है, कृपया मेरे ससुर को परेशान न किया जाए। मेरे अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी मेरे ममेरे भाई निभाएंगे।” यह भावुक अपील उनके टूटे हुए मन और परिवार पर आए संकट की भयावहता को बयां करती है।

मृतकों में परिवार के मुखिया, उनकी पत्नी, तीन मासूम बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता शामिल हैं। यह पूरा परिवार पंचकूला में किराए के मकान में रह रहा था। सोमवार को उन्होंने बागेश्वर धाम के बाबा धीरेंद्र शास्त्री के आध्यात्मिक कार्यक्रम में भाग लिया था। लेकिन लौटते समय उन्होंने मौत को गले लगाने का फैसला कर लिया।

इस घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। जहां एक ओर देश आर्थिक प्रगति की बात करता है, वहीं दूसरी ओर एक परिवार कर्ज के बोझ तले दम तोड़ देता है। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें कर्ज तले दबे लोग जीने की बजाय मरने को मजबूर हो जाते हैं।

पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और आगे की जांच की जा रही है। लेकिन अब कोई भी जांच इन सात जिंदगीयों को वापस नहीं ला सकती। यह आत्महत्या नहीं, बल्कि एक ऐसी चीत्कार है जो समाज, सरकार और व्यवस्था सभी से सवाल करती है – आखिर क्यों एक पूरा परिवार मौत को गले लगाने पर मजबूर हुआ? शीतल निर्भीक की खास खबरें।

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